सोमवार, 3 मई 2010

छी.छी.छी...

- चलो, उस पार्क में चलते हैं।
- हां, चलो।
- अरे, यह क्या...
- छी...छी...छी...
- पूरा माहौल गंदा कर रखा है। कहीं भी बैठने के लिए जगह नहीं छोड़ी है।
- हां, चारों और एक ही नजारा दिख रहा है।
- क्या जमाना आ गया है। शर्म-लिहाज नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई है। लड़के तो लड़के, अब ये लड़कियां भी...। राम बचाए इन लोगों से...।
- वह देखो, कैसे कसकर पकड़ा है, जैसे मुई कहीं भागी जा रही है। अबे, अपने घर वालों को धोखा देकर ही तेरे संग रंगरलियां मनाने आई है, कहीं भागकर नहीं जाएगी, सब्र से काम ले।
- अमां यार, यहां तो बैठने जैसा कोई माहौल ही नहीं है। चलो-चलो, खिसको यहां से। पास के दूसरे पार्क में चलें।
दूसरे पार्क में पहुंचने पर...
- यहां ठीक रहेगा।
- चलो, उस बेंच पर बैठते हैं।
- हां, चलो।
- ला यार, पकौड़े का पैकेट मुझे दे।
- यार, उस झाड़ी के पीछे सरसराहट कैसी...
- हां, मैंने भी गौर किया।
- कौन है झाड़ी के पीछे...
- छी...छी..छी, यहां भी वही...।
- कमबख्तों ने सभ्य आदमियों के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं छोड़ी है।
-हां, हर पार्क में वही नजारा है...सभ्यता को तो जैसे वक्त निगल चुका है।
- क्या जमाना आ गया है, कैसा-कैसा देखने को मिल रहा है...। हमारा भी लिहाज नहीं कर रहे हैं, इनकी बाप की उम्र के होंगे।
- इससे तो अच्छा है कि घर पर ही...चलो, घर चलें।
दरअसल, इवनिंग वाक करते हुए बुधन चचा को उनके एक पुराने मित्र मिल गए। घर पर बच्चे तंग करते हैं, इसलिए वह उनके साथ अपने पुराने दिनों की याद ताजा करने के लिए पार्क में आ गए। लेकिन, दिल्ली के पार्कों में अमूमन क्या नजारा होता है, आपको तो मालूम ही है। ऐसा नजारा देखकर बुधन चचा के तो होश फाख्ता हो गए और उन्होंने दोबारा पार्क में न आने की कसम खा ली।
खैर, अपने मित्र के साथ जब बुधन चचा घर पहुंचे, तो ड्राइंग रूम में कोई नहीं था, पर टीवी चल रहा था।
बुधन चचा कथित लापरवाही पर चिल्ला ही रहे थे कि उनकी नजर टीवी स्क्रीन पर पड़ी, बरबस ही उनके मुंह से निकला- छी...छी...छी, यहां भी वही...हे राम...
दरअसल, उस वक्त टीवी पर इमोशनल अत्याचार नामक कार्यक्रम में दो युवाओं के बीच रोमांस-लीला चल रही थी। इसके बाद उनकी नजर सामने टेबल पर रखी शुक्रवार साप्ताहिक पत्रिका पर पड़ी, तो उसके कवर पर भी ललित मोदी किसी महिला को अपनी बाहों में लिए हुए थे।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

क्रिकेट में आरक्षण

इंटरनेट पर विचरण कर रहा था, तो यह रोचक चीज हाथ लगी- क्रिकेट में आरक्षण हो, तो

I think we should have job reservations in all the fields. I
completely support the PM and all the politicians for promoting this.
Let's start the reservation with our cricket team. We should have 10
percent reservation for Muslims. 30 percent for OBC, SC/ST like that.
Cricket rules should be modified accordingly.

The boundary circle should be reduced for an SC/ST player. The four
hit by an OBC player should be considered as a six and a six hit by an
OBC player should be counted as 8 runs. An OBC player scoring 60 runs
should be declared as a century.

We should influence ICC and make rules so that the pace bowlers like
Shoaib Akhtar should not bowl fast balls to our OBC player.

Bowlers should bowl maximum speed of 80 km/ hour to an OBC player.

Any delivery above this speed should be made illegal.

Also we should have reservation in Olympics. In the 100 meters race,
an OBC player should be given a gold medal if he runs 80 meters.

There can be reservation in Government jobs also. Let's recruit SC/ST
and OBC pilots for aircrafts which are carrying the ministers and
politicians (that can really help the country...)

Ensure that only SC/ST and OBC doctors do the operations for the
ministers and other politicians. (Another way of saving the
country...)

Let's be creative and think of ways and means to guide INDIA forward...
Let's show the world that INDIA is a GREAT country.
Let's be proud of being an INDIAN...

May the good breed of politicians like ARJUN SINGH long live...

"Education's purpose is to replace an empty mind with an open
one."

रविवार, 11 अप्रैल 2010

दिल तो बच्चा है जी...

कुछ तस्वीरें ऐसी होती है, जिसके बारे में बोलने की जरूरत नहीं होती है, बल्कि वह खुद ब खुद बोलती हैं।
इंटरनेट पर विचरण करते हुए ऐसी ही एक तस्वीर मिली। आपके लिए-
दिल तो बच्चा है जी....
 
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