गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

पत्रकार साहब की कहानी

वर्मातंत्र
एक वर्मा जी हैं। अपने करीबी लोगों में से एक हैं। वर्मा जी की तारीफ यह है कि हर बात पर उनके पास एक किस्सा होता है। किस्सा भी ऐसा-वैसा नहीं, कभी रोचक, तो कभी ज्ञानवर्धक। ऐसे में मैंने सोचा कि जब पंचतंत्र लिखा जा सकता है, तो अपने वर्मा जी का वर्मातंत्र क्यों नहीं...सो, वर्मातंत्र की पहली कहानी आपके लिए...इस दावे के साथ कि वर्मातंत्र की कहानियां रोचकता व ज्ञान की कसौटी पर खरी न उतरे, तो आपका समय सूद सहित वापस किया जाएगा…

यह एक छोटे-से कस्बे का किस्सा है। यहां हरिओम लालाजी की परचून की दुकान थी। वैसे तो लालाजी की दुकान ठीक-ठाक चल रही थी, पर उन्हें एक दिक्कत थी। दिक्कत यह थी कि गामा नाम का एक दादा टाइप शख्स हर महीने उनकी दुकान से कुछ न कुछ सामान ले जाता और पैसे न चुकाता। वह हर बार लालाजी से कहता- उधार खाते में चढ़ा लेना। लेकिन पिछले एक साल से उसने लालाजी को एक फूटी पाई तक न दी थी। सौ-पचास से शुरू हुआ उसका बहीखाता हजारों में पहुंच चुका था। इसके बाद भी वह धड़ल्ले से उधार खाता चलवाया जा रहा था।

लालाजी से कुछ कहते भी नहीं बन रहा था। लालाजी उसके सामने बेबस नजर आ रहे थे। क्योंकि उन्होंने उससे कुछ कहा, तो वह न जाने उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा? यही डर लालाजी को लगा रहता। भई, वह दादा जो था, जाने लालाजी का कितना नुकसान कर दे।

एक दिन किसी ने लालाजी को इस समस्या की युक्ति बताई। बताने वाले ने लालाजी से कहा- सामने पेड़ के नीचे एक पत्रकार साहब बैठते हैं, आप उनसे अपनी समस्या का जिक्र करें, तो वह आपकी कुछ न कुछ मदद जरूर करेंगे।

लालाजी के लिए तो जैसे यह कोई इंद्रवाणी हो, वह फौरन पत्रकार साहब के सामने हाजिर हुए और अपना दुखड़ा रोया।
कहानी पढ़ने में बड़ी न लगे, इसलिए यहां एक इंटरवेल है

पत्रकार साहब ने माजरा जाना, तो वह लालाजी पर भड़क उठे- क्या लालाजी, आप भी...एक गुंडा-मवाली आपको इतने समय से परेशान कर रहा है और आप अब आ रहे हैं! इसके बाद पत्रकार साहब ने थानेदार मिश्राजी को फोन खड़खड़ाया- क्या मिश्राजी, आपके नाक के नीचे रंगदारी मांगी जा रही है और आप बेखबर है...

क...क...कौन...और कहां रंगादारी मांग रहा है पत्रकार साहब....यह आप क्या बात कर रहे हैं...मेरे इलाके में और वह भी रंगदारी!

पत्रकार साहब ने लालाजी का पूरा किस्सा थानेदार साहब को सुना दिया। इसके बाद उन्होंने लालाजी से थाने जाकर थानेदार से मिलने और अपनी समस्या बताने को कहा।

थाना-थानेदार!- लालाजी जी को पसीना आने लगा, वह पत्रकार साहब से बोले- साहब, मैं कहीं किसी और लफड़े में तो नहीं पड़ जाऊंगा...

वह बोल ही रहे थे कि पत्रकार साहब ने उन्हें सहारा दिया- नहीं-नहीं लालाजी, आप नाहक परेशान हो रहे हैं...पुलिस-प्रशासन होती ही जनता की मदद के लिए है....कोई दिक्कत नहीं होगी, आप निश्चिंत रहिए और कोई दिक्कत हो, तो आप मुझे बताइएगा, मैं यहीं बैठा हूं न...

पत्रकार साहब की दिलेरी देखकर लालाजी ने भी हौसला बढ़ाया और पहुंच गए थाने। थानेदार ने उनकी रपट लिखी और अपनी कार्यवाई शुरू कर दी। गामा को गिरफ्तार किया गया और उसकी इतनी कुटाई की गई कि उसकी पेशाब ही छूट गई। वह- माई बाप रहम-माई बाप रहम, ही रटता रह गया।
खैर, लालाजी के पास यह खबर पहुंची, तो वह फूले न समाए। फौरन एक मिठाई का डिब्बा लेकर पत्रकार साहब के सामने हाजिर हुए।

मिठाई का डिब्बा देखकर पत्रकार साहब ने लालाजी को फिर लताड़ लगाई- अरे-अरे, यह क्या है...मैं यह सब नहीं लेता हूं...
कहानी पढ़ने-देखने में बड़ी न लगे, इसलिए यहां एक और इंटरवेल लिया गया है।

लेकिन जब लालाजी अपनी जिद पर अड़े रहे, तो पत्रकार साहब बोले- अगर आप इतने ही खुश हैं और आपको यह मिठाई का डिब्बा देना ही है, तो थानेदार साहब को दीजिए...वास्तव में उन्होंने ही आपकी मदद की है, मैंने तो बस एक फोन भर कर दिया था...।

जैसी आपकी आज्ञा कहकर लालाजी चल निकले थाने की ओर। जब वह थाने पहुंचे, तो उस वक्त थानेदार साहब कहीं गए हुए थे। उन्होंने पास बैठे पुलिस वाले को मिठाई का डिब्बा थमाते हुए कहा- यह थानेदार साहब को दे दीजिएगा और कहिएगा कि हरिओम लाला आया था।
क्या लालाजी, केवल मिठाई का डिब्बा!

नहीं-नहीं, आप कैसी बात कर रहे हैं (यह कहते-कहते लालाजी ने हजार का एक नोट पुलिस वाले को थमा दिया।

इस तरह यह किस्सा आया-गया और हो गया। लेकिन लालाजी पत्रकार साहब की मेहरबानी, उपकार को भूल नहीं पाए थे।

खैर, एक दिन पत्रकार साहब लालाजी की दुकान के पास से गुजर रहे थे, तो लालाजी ने उन्हें आवाज दी और चाय पिलाई। पत्रकार साहब ने भी उनकी खैर-ख्वाह पूछी। इस बीच पत्रकार साहब ने जेब से राशन की एक पर्चा निकाली और लालाजी के नौकर की ओर बढ़ा दी। नौकर ने पर्ची में लिखा सामान एक थैली में बांधकर पत्रकार साहब की ओर बढ़ा दिया।

इसके बाद जब पत्रकार साहब चलने को हुए, तो उन्होंने लालाजी से सामान का हिसाब पूछा- कितने पैसे हुए लालाजी?

जो लालाजी पत्रकार साहब के उपकार के बोझ तले दबे हों, जिन पत्रकार साहब की वजह से लालाजी को एक गुंडे से हमेशा के लिए निजात मिली हो, वह लालाजी क्या पत्रकार साहब से सामान के तीन-चार सौ रुपए लेते, लालाजी बोले- अरे भाईसाहब, आप क्या बात करते हैं...।
यानी इस तरह पैसे न लेकर लालाजी ने अप्रत्यक्ष रूप से पत्रकार साहब के उपकार का कर्ज उतारने की कोशिश भर की।

(कहानी में आगे क्या होता है- यह दूसरी किश्त में)

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

भगवान को खत

प्रिय भगवन,
आशा है कि आपके स्वर्ग में सब कुशल मंगल होगा! यहां हमारी धरती पर तो...। अब आपसे क्या छिपाना भगवन, यहां सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। आपको अंदर की एक बात बताऊं भगवन, उल्टा-पुल्टा यहां चल रहा है और इसे चला भी यहां के लोग रहे हैं, लेकिन आरोप सरेआम आप पर लगाए जाते हैं! हर बात पर बाशिंदे कहते हैं- सब भगवान की मर्जी!
धरती पर जो गड़बड़ चल रही है, क्या भगवन ये वास्तव में आपकी स्वीकृति से हो रहा है? नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है, आप तो भगवान हैं, ऐसी ऊल-जलूल हरकतों में कतई शामिल न होंगे!

ये तो यहीं के लोग बदमाश हैं। करते खुद हैं और भरते वक्त कह देते हैं- सब भगवान की मर्जी! आप जल्द ही इन्हें सबक सिखाओ भगवन, नहीं तो ये आपका नाम पूरी तरह मिट्टी में मिला देंगे।

अब आपसे क्या छिपाना भगवन, आज आपको पत्र इसलिए ही लिख रहा हूं, ताकि आपको धरती की सटीक वास्तुस्थिति से अवगत करवा सकूं।

खैर, मुद्दे की बात पर आता हूं। अब आप से क्या छिपाना भगवन, आम आदमी की जिंदगी नरक जैसी हो गई है। सबसे ज्यादा महंगाई ने दुखी कर रखा है। आलू तक, जिसको कोई पूछता भी नहीं था, ससुर वही 35 रुपए किलो बिक रहा है। बाकी सब्जियों या दालों के दाम तो छोड़ ही दो। अब तो शाम को जब पत्नी फोन करके कहती है- घर आते वक्त ये ले आना, वो ले आना, तो मैं बहाना मार देता हूं- आज आफिस में बहुत काम है, इसलिए देर से आऊंगा, घर में जो कुछ है, वही बना लो। अब आफिस में कुछ काम-वाम तो होता नहीं, इसलिए देर से घर जाने के चक्कर में बेमतलब में दो-तीन घंटे किसी पार्क में गुजारने पड़ते हैं।

जब घर पहुंचता हूं, तो भी बीवी गरिया-गिरयाकर जीना हराम कर देती है। आपको याद करते कहती है- हे भगवान, कैसे आफिस वाले हैं इनके, मुए, काम तो बढ़ा देते हैं, पर मजदूरी नहीं बढ़ाते। फिर वह नसीहत देती है- छोड़ क्यों नहीं देते यह नौकरी? अब उसे कैसे समझाऊं कि यह नौकरी छोड़ दी, तो मेरी आलू छोड़, उसके छिलके खरीदने की औकात भी न रह जाएगी।
अब मैं सबका दुखड़ा क्या रोऊं, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि दो जनों के परिवार की यह हालत है, तो जिनके घरों में खाने वाले छह-सात जन हैं, उनका क्या हाल होगा? सो भगवन, आपसे निवेदन है कि इस कलमुई महंगाई की अर्थी उठाने के लिए यमराज जी को अतिशीघ्र आदेश दीजिए।

अब आपसे क्या छिपाना भगवन, पानी और बिजली का भी हाल बुरा है। पाताललोक का पानी तो यहां के बाशिंदों ने पूरा सोख लिया है, ऊपर से आप भी बारिश करवाने में कंजूसी बरतने लगे हैं? लगता है कि आपकी टंकी में भी पानी की कमी है। बड़ी टैंकी की जरूरत हो, तो कह देना, यहां से भिजवा दूंगा, पर बारिश करने में कंजूसी न करिएगा।

हां भगवन, पानी की कमी के कारण इधर कवियों की मौज जरूर हो गई है। अब आपको तो मालूम ही है कि अपन के दिल में भी एक कवि रहता है, तो इधर अपन ने भी सोचा कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिया जाए। भगवन, सबसे पहले आपको ही अपनी कविता समर्पित कर रहा हूं- अब नहीं सुनाई देती, टप-टप की आवाज, अपने शहर में, नल खड़े हैं- ठूंठ की तरह।

बिजली का भी यही हाल है, उस पर भी मैंने एक कविता लिखी है भगवन, सुनाऊं क्या- आपके यहां बत्ती है? नहीं है! आपके यहां? नहीं है! और आपके यहां? नहीं है! ये, सभी जगह बत्ती गुल क्यों है!

अच्छा भगवन, एक और बात बताऊं, पानी-बिजली गुल है, पर नकली नोटों की भरमार है। बैंक तक में नकली नोट धड़ल्ले से मिल रहे हैं। हां, हां, बैंक तक में! अब तो लोग एक-दूसरे से नोट लेते हुए डरने लगे हैं। किसी को पांच सौ का नोट दे दो, तो वह उसे ऐसे उलटता-पलटता है कि अपने ऊपर ही शक होने लगता है। जब तक वह नोट को ऊपर-नीचे से टटोलता रहता है, तब तक दिल में धक-धक होती रहती है कि कहीं वास्तव में नकली न निकल जाए।

खैर, अब अपराधों के बारे में आपसे क्या छिपाना भगवन, चारों ओर अपराधों का ही बोलबाला है। हत्या, लूट, अपहरण, बलात्कार...हर रोज ऐसी घटनाएं सुनने-देखने को मिल रही हैं। बड़ा आश्चर्य है कि अपनी इतनी लंबी जिंदगी में मैंने आज तक किसी का नाम रावण, कंस, दुर्योधन नहीं सुना, लेकिन ये अपराध जाने कैसे दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से कैसे हो रहे हैं।


खैर, भगवन, अब और क्या-क्या बताऊं, आपको ही कभी फुर्रसत मिले, तो धरती की ओर भी एक नजर मार लीजिएगा। आपके बारे में काफी सुन रखा है कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे, तब-तब आप कोई अवतार लेकर यहां आएंगे।
अच्छा भगवन, एक बात आपसे पूछनी थी- ये आपने अपने प्रचार के लिए इतने सारे बाबाओं को क्यों लगा रखा है? आपको भी प्रचार की जरूरत पड़ती है क्या? जिस गली में देखो, वहां आपका नाम लेते एक बाबा बैठा मिलता है। अब तो आलम यह हो गया है कि बाबाओं की पहुंच बैडरूम तक हो गई है। मतलब, टीवी पर भी हर चैनल पर एक बाबा दिख जाता है। आपको एक अंदर की बात बताऊं भगवन, कई चैनल वाले तो आपके दुश्मनों (भूतों) का भी प्रचार कर रहे हैं। पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रोता है, तो मां कहती है- चुप हो जा, नहीं तो भूतों वाला चैनल लगा दूंगी।

आखिर में भगवन आपसे एक छोटी-सी गुजारिश है- किसी से कहिएगा नहीं कि मैंने आपको पत्र लिखा है, नहीं तो मुझे धरती-निकाला दे दिया जाएगा। नमस्कार।

आपका शुभचिंतक
एक धरतीवासी
(यह रचना “शुक्रवार” पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है)

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

प्रेम कहानी

एक ‘अ’ नाम का प्रेमी है। क्या आप इस प्रेमी को पहले से जानते-पहचानते हैं? शायद नहीं जानते-पहचानते होंगे, क्योंकि यह तो मेरी कहानी का पात्र है और मैं ही इससे आपको मिलवाउंगा...
खैर, जब ‘अ’ नाम का प्रेमी है, तो जाहिर सी बात है कि उसकी कोई न कोई प्रेमिका भी होगी! प्रेमिका ही नहीं होगी, तो वह किस बात का प्रेमी! तो साहब, इसकी एक प्रेमिका भी है, जिसका नाम ‘ब’ है। आप शायद इसे भी नहीं जानते होंगे? कहां से जानेंगे, यह भी तो मेरी कहानी...।
- आगे बताएंगे कि कहानी क्या है... ?
बताता हूं, बताता हूं...हां तो साहब, दोनों के बीच गजब का प्रेम है। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं। इसका एक उदाहरण देखिए, एक बार प्रेमिका ने प्रेमी से पूछा- तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो, तो जानते हैं प्रेमी ने क्या कहा? प्रेमी ने कहा- मैं तुम्हारे लिए आकाश से चांद-तारे तोड़कर ला सकता हूं। देखिए साहब, क्या गजब का प्रेम था दोनों में, प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए चांद-तारे तोड़कर लाने की बात कर रहा है...।
- वे प्रेमी-प्रेमिका हैं, तो इस तरह की बातें उनके बीच में होंगी ही...यह बताओ कि आपकी प्रेम कहानी में आगे क्या होता है...?
अब इससे आगे क्या होना है, जब दोनों एक-दूसरे के बिना अपने आपको अधूरा समझने लगे, तो उन्होंने शादी कर ली। और अब वे पूरी तरीके से दो जिस्म एक जान हो लिए। अब दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकती है। यानी उन दोनों को साथ-साथ रहने का सामाजिक प्रमाण-पत्र मिल गया है।
- अरे यार, यह बताओ कि इस प्रेम कहानी में आगे क्या होता है...?
अब आगे क्या होना था साहब, दोनों का मिलन हो गया है, तो जाहिर सी बात है कि इसके बाद उनके बच्चे ही होने थे, वही हुए...
उन्होंने अपने बच्चों को खूब प्यार दिया। ऊंची तालीम दी। इससे उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल रहा। वे अच्छी-अच्छी कंपनियों में ऊंचे-ऊंचे ओहदे पर काम करने लगे। यह देखकर ‘अ’ व ‘ब’ को काफी खुशी हुई।
- यहां तक हमारे समझ में कहानी आ गई, आगे बताओ कि फिर क्या हुआ...?
‘अ’ व ‘ब’ अब काफी बूढ़े हो चुके थे। करीब साठ-सत्तर साल के। लेकिन उनका प्यार आज भी जवां था। सोलह साल की तरह। जब वे पहली बार मिले थे।
- अरे यार, इस प्रेम कहानी में कोई ट्वीस्ट-विस्ट भी है या नहीं...?
क्या हर प्रेम कहानी में ट्वीस्ट-विस्ट होना जरूरी है? क्या हर प्रेम कहानी मार-धाड़ या सामाजिक विद्रोह जरूरी है? आपकी लिखी प्रेम कहानी में ये सब चीजें जरूरी होंगी, पर अपन की कहानी में ऐसा बिल्कुल नहीं है...
- अच्छा, आगे बताओ कि कहानी में क्या हुआ?
नहीं, आप खुद ही बताइए कि अब कहानी में होने के लिए कुछ बचा है? दोनों ने प्रेम कर लिया, शादी कर ली, बच्चे पैदा कर लिए और आज भी उनके बीच प्यार की तासीर सोलह साल वाली ही है, एक प्रेम कहानी में इससे ज्यादा और क्या चाहिए... ! ‘अ’ व ‘ब’ की प्रेम कहानी यहीं समाप्त होती है...
- क्या सड़ी हुई प्रेम कहानी है...!
अच्छा, मेरी लिखी हुई कहानी सड़ी है... अच्छा, यह बताइए साहब कि अगर मैं अपनी इस प्रेम कहानी में ‘अ’ की जगह आपका और ‘ब’ की जगह आपकी प्रेमिका का नाम लिख देता, तब क्या कहना होता आपका, मेरी इस सड़ी हुई प्रेम कहानी के बारे में...बताओ....बताओ…?

शनिवार, 26 सितंबर 2009

आडवाणी

एक ने कहा-
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा!
दूसरे ने भी कहा-
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा, जो करना है, वो कर लो!
यार, आखिर में हुआ क्या, यह बताओ!
जो चिल्ला रहा था-
आडवाणी तुम जाओ, आडवाणी तुम जाओ
आडवाणी ने उसे ही चलता कर दिया!
और सुनो…
आडवाणी ने अपने आदमियों को और ऊंची पोस्ट पर बैठा दिया
और सुनो…
अब कोई नहीं कहता-
आडवाणी तुम जाओ!
जो चाह भी रहे थे यह कहना
अब वो कहते हैं-
आडवाणी तुम्हें जब जाना हो, तब जाओ!

समझदार शहरी

एक "समझदार शहरी" ने
दीवारों पर लिखा था-
"गधे के पूत यहां मत मूत"

नल और ठूंठ

अब नहीं सुनाई देती
टप-टप की आवाज
अपने शहर में
नल खड़े हैं-
ठूंठ की तरह

सोमवार, 4 मई 2009

सबक

झांसा दो, मगर ऐसा...
एक ब्रह्मांड है। इस ब्रह्मांड पर एक धरती है। इस धरती पर एक देश है। इस देश में लोकतंत्र नाम की एक चीज है। यानी यहां जनता को एक हक मिला हुआ है। वह जिसकी चाहे, उसकी सरकार बना सकती है। हर पांच साल बाद यहां चुनाव होते हैं। चुनाव में भाग लेने वाली एक पार्टी पंजा छाप है और दूसरी कमल छाप। इसके अलावा कई और पार्टियां भी हैं। उनका नाम जानना अभी आपके लिए बहुत जरूरी नहीं है। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि इन दो पार्टियों में से कोई एक सरकार बना लेती है।
खैर, बात को रबर की तरह से खींचने से क्या फायदा। मैं जो कहना चाह रहा हूं, आप वह सुन लीजिए। होता यह है कि ये तमाम पार्टियां हर चुनाव में जनता को
ए-क्लास का झांसा दे देती हैं। यानी उसके हक को हड़प जाती हैं और डकार भी नहीं लेतीं।
अब कहानी का सार सुन लीजिए। दरअसल, झांसे कई तरह दिए जा सकते हैं। हो सकता है कि आपने भी कभी किसी को किसी तरह का कोई झांसा दिया होगा। लेकिन शर्तिया है कि ऐसा झांसा आपने आज तक नहीं दिया होगा। क्या आप साठ साल तक झांसा देकर किसी जनता को ठेंगा दिखा सकते हैं?
अब कहानी से सीख भी ले लीजिए। यह झांसे का सबसे उत्तम तरीका है। दे सको तो ऐसा झांसा दो।

परिचय

ब्लागर मित्रों को मेरा नमस्कार। मेरा नाम तो आप जान ही रहे हैं- ललित पांडे। यह भी बता चुका हूं कि लिखास रोग से पीड़ित हूं। ना..ना.. रोग का मतलब किसी बीमारी से कतई नहीं है। मुझे कोई बीमारी नहीं है। लिखास रोग तो मुझे जिंदगी देता
है। मेरे दिमाग को साफ रखता है। हां, केवल यह बताना बाकी है कि अपने रोग को बढ़ाने के लिए इन दिनों में पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में बैठा हूं।
 
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