झांसा दो, मगर ऐसा...
एक ब्रह्मांड है। इस ब्रह्मांड पर एक धरती है। इस धरती पर एक देश है। इस देश में लोकतंत्र नाम की एक चीज है। यानी यहां जनता को एक हक मिला हुआ है। वह जिसकी चाहे, उसकी सरकार बना सकती है। हर पांच साल बाद यहां चुनाव होते हैं। चुनाव में भाग लेने वाली एक पार्टी पंजा छाप है और दूसरी कमल छाप। इसके अलावा कई और पार्टियां भी हैं। उनका नाम जानना अभी आपके लिए बहुत जरूरी नहीं है। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि इन दो पार्टियों में से कोई एक सरकार बना लेती है।
खैर, बात को रबर की तरह से खींचने से क्या फायदा। मैं जो कहना चाह रहा हूं, आप वह सुन लीजिए। होता यह है कि ये तमाम पार्टियां हर चुनाव में जनता को
ए-क्लास का झांसा दे देती हैं। यानी उसके हक को हड़प जाती हैं और डकार भी नहीं लेतीं।
अब कहानी का सार सुन लीजिए। दरअसल, झांसे कई तरह दिए जा सकते हैं। हो सकता है कि आपने भी कभी किसी को किसी तरह का कोई झांसा दिया होगा। लेकिन शर्तिया है कि ऐसा झांसा आपने आज तक नहीं दिया होगा। क्या आप साठ साल तक झांसा देकर किसी जनता को ठेंगा दिखा सकते हैं?
अब कहानी से सीख भी ले लीजिए। यह झांसे का सबसे उत्तम तरीका है। दे सको तो ऐसा झांसा दो।
सोमवार, 4 मई 2009
परिचय
ब्लागर मित्रों को मेरा नमस्कार। मेरा नाम तो आप जान ही रहे हैं- ललित पांडे। यह भी बता चुका हूं कि लिखास रोग से पीड़ित हूं। ना..ना.. रोग का मतलब किसी बीमारी से कतई नहीं है। मुझे कोई बीमारी नहीं है। लिखास रोग तो मुझे जिंदगी देता
है। मेरे दिमाग को साफ रखता है। हां, केवल यह बताना बाकी है कि अपने रोग को बढ़ाने के लिए इन दिनों में पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में बैठा हूं।
है। मेरे दिमाग को साफ रखता है। हां, केवल यह बताना बाकी है कि अपने रोग को बढ़ाने के लिए इन दिनों में पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में बैठा हूं।
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