- चलो, उस पार्क में चलते हैं।
- हां, चलो।
- अरे, यह क्या...
- छी...छी...छी...
- पूरा माहौल गंदा कर रखा है। कहीं भी बैठने के लिए जगह नहीं छोड़ी है।
- हां, चारों और एक ही नजारा दिख रहा है।
- क्या जमाना आ गया है। शर्म-लिहाज नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई है। लड़के तो लड़के, अब ये लड़कियां भी...। राम बचाए इन लोगों से...।
- वह देखो, कैसे कसकर पकड़ा है, जैसे मुई कहीं भागी जा रही है। अबे, अपने घर वालों को धोखा देकर ही तेरे संग रंगरलियां मनाने आई है, कहीं भागकर नहीं जाएगी, सब्र से काम ले।
- अमां यार, यहां तो बैठने जैसा कोई माहौल ही नहीं है। चलो-चलो, खिसको यहां से। पास के दूसरे पार्क में चलें।
दूसरे पार्क में पहुंचने पर...
- यहां ठीक रहेगा।
- चलो, उस बेंच पर बैठते हैं।
- हां, चलो।
- ला यार, पकौड़े का पैकेट मुझे दे।
- यार, उस झाड़ी के पीछे सरसराहट कैसी...
- हां, मैंने भी गौर किया।
- कौन है झाड़ी के पीछे...
- छी...छी..छी, यहां भी वही...।
- कमबख्तों ने सभ्य आदमियों के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं छोड़ी है।
-हां, हर पार्क में वही नजारा है...सभ्यता को तो जैसे वक्त निगल चुका है।
- क्या जमाना आ गया है, कैसा-कैसा देखने को मिल रहा है...। हमारा भी लिहाज नहीं कर रहे हैं, इनकी बाप की उम्र के होंगे।
- इससे तो अच्छा है कि घर पर ही...चलो, घर चलें।
दरअसल, इवनिंग वाक करते हुए बुधन चचा को उनके एक पुराने मित्र मिल गए। घर पर बच्चे तंग करते हैं, इसलिए वह उनके साथ अपने पुराने दिनों की याद ताजा करने के लिए पार्क में आ गए। लेकिन, दिल्ली के पार्कों में अमूमन क्या नजारा होता है, आपको तो मालूम ही है। ऐसा नजारा देखकर बुधन चचा के तो होश फाख्ता हो गए और उन्होंने दोबारा पार्क में न आने की कसम खा ली।
खैर, अपने मित्र के साथ जब बुधन चचा घर पहुंचे, तो ड्राइंग रूम में कोई नहीं था, पर टीवी चल रहा था।
बुधन चचा कथित लापरवाही पर चिल्ला ही रहे थे कि उनकी नजर टीवी स्क्रीन पर पड़ी, बरबस ही उनके मुंह से निकला- छी...छी...छी, यहां भी वही...हे राम...
दरअसल, उस वक्त टीवी पर इमोशनल अत्याचार नामक कार्यक्रम में दो युवाओं के बीच रोमांस-लीला चल रही थी। इसके बाद उनकी नजर सामने टेबल पर रखी शुक्रवार साप्ताहिक पत्रिका पर पड़ी, तो उसके कवर पर भी ललित मोदी किसी महिला को अपनी बाहों में लिए हुए थे।
सोमवार, 3 मई 2010
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