रविवार, 4 अक्टूबर 2009

भगवान को खत

प्रिय भगवन,
आशा है कि आपके स्वर्ग में सब कुशल मंगल होगा! यहां हमारी धरती पर तो...। अब आपसे क्या छिपाना भगवन, यहां सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। आपको अंदर की एक बात बताऊं भगवन, उल्टा-पुल्टा यहां चल रहा है और इसे चला भी यहां के लोग रहे हैं, लेकिन आरोप सरेआम आप पर लगाए जाते हैं! हर बात पर बाशिंदे कहते हैं- सब भगवान की मर्जी!
धरती पर जो गड़बड़ चल रही है, क्या भगवन ये वास्तव में आपकी स्वीकृति से हो रहा है? नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है, आप तो भगवान हैं, ऐसी ऊल-जलूल हरकतों में कतई शामिल न होंगे!

ये तो यहीं के लोग बदमाश हैं। करते खुद हैं और भरते वक्त कह देते हैं- सब भगवान की मर्जी! आप जल्द ही इन्हें सबक सिखाओ भगवन, नहीं तो ये आपका नाम पूरी तरह मिट्टी में मिला देंगे।

अब आपसे क्या छिपाना भगवन, आज आपको पत्र इसलिए ही लिख रहा हूं, ताकि आपको धरती की सटीक वास्तुस्थिति से अवगत करवा सकूं।

खैर, मुद्दे की बात पर आता हूं। अब आप से क्या छिपाना भगवन, आम आदमी की जिंदगी नरक जैसी हो गई है। सबसे ज्यादा महंगाई ने दुखी कर रखा है। आलू तक, जिसको कोई पूछता भी नहीं था, ससुर वही 35 रुपए किलो बिक रहा है। बाकी सब्जियों या दालों के दाम तो छोड़ ही दो। अब तो शाम को जब पत्नी फोन करके कहती है- घर आते वक्त ये ले आना, वो ले आना, तो मैं बहाना मार देता हूं- आज आफिस में बहुत काम है, इसलिए देर से आऊंगा, घर में जो कुछ है, वही बना लो। अब आफिस में कुछ काम-वाम तो होता नहीं, इसलिए देर से घर जाने के चक्कर में बेमतलब में दो-तीन घंटे किसी पार्क में गुजारने पड़ते हैं।

जब घर पहुंचता हूं, तो भी बीवी गरिया-गिरयाकर जीना हराम कर देती है। आपको याद करते कहती है- हे भगवान, कैसे आफिस वाले हैं इनके, मुए, काम तो बढ़ा देते हैं, पर मजदूरी नहीं बढ़ाते। फिर वह नसीहत देती है- छोड़ क्यों नहीं देते यह नौकरी? अब उसे कैसे समझाऊं कि यह नौकरी छोड़ दी, तो मेरी आलू छोड़, उसके छिलके खरीदने की औकात भी न रह जाएगी।
अब मैं सबका दुखड़ा क्या रोऊं, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि दो जनों के परिवार की यह हालत है, तो जिनके घरों में खाने वाले छह-सात जन हैं, उनका क्या हाल होगा? सो भगवन, आपसे निवेदन है कि इस कलमुई महंगाई की अर्थी उठाने के लिए यमराज जी को अतिशीघ्र आदेश दीजिए।

अब आपसे क्या छिपाना भगवन, पानी और बिजली का भी हाल बुरा है। पाताललोक का पानी तो यहां के बाशिंदों ने पूरा सोख लिया है, ऊपर से आप भी बारिश करवाने में कंजूसी बरतने लगे हैं? लगता है कि आपकी टंकी में भी पानी की कमी है। बड़ी टैंकी की जरूरत हो, तो कह देना, यहां से भिजवा दूंगा, पर बारिश करने में कंजूसी न करिएगा।

हां भगवन, पानी की कमी के कारण इधर कवियों की मौज जरूर हो गई है। अब आपको तो मालूम ही है कि अपन के दिल में भी एक कवि रहता है, तो इधर अपन ने भी सोचा कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिया जाए। भगवन, सबसे पहले आपको ही अपनी कविता समर्पित कर रहा हूं- अब नहीं सुनाई देती, टप-टप की आवाज, अपने शहर में, नल खड़े हैं- ठूंठ की तरह।

बिजली का भी यही हाल है, उस पर भी मैंने एक कविता लिखी है भगवन, सुनाऊं क्या- आपके यहां बत्ती है? नहीं है! आपके यहां? नहीं है! और आपके यहां? नहीं है! ये, सभी जगह बत्ती गुल क्यों है!

अच्छा भगवन, एक और बात बताऊं, पानी-बिजली गुल है, पर नकली नोटों की भरमार है। बैंक तक में नकली नोट धड़ल्ले से मिल रहे हैं। हां, हां, बैंक तक में! अब तो लोग एक-दूसरे से नोट लेते हुए डरने लगे हैं। किसी को पांच सौ का नोट दे दो, तो वह उसे ऐसे उलटता-पलटता है कि अपने ऊपर ही शक होने लगता है। जब तक वह नोट को ऊपर-नीचे से टटोलता रहता है, तब तक दिल में धक-धक होती रहती है कि कहीं वास्तव में नकली न निकल जाए।

खैर, अब अपराधों के बारे में आपसे क्या छिपाना भगवन, चारों ओर अपराधों का ही बोलबाला है। हत्या, लूट, अपहरण, बलात्कार...हर रोज ऐसी घटनाएं सुनने-देखने को मिल रही हैं। बड़ा आश्चर्य है कि अपनी इतनी लंबी जिंदगी में मैंने आज तक किसी का नाम रावण, कंस, दुर्योधन नहीं सुना, लेकिन ये अपराध जाने कैसे दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से कैसे हो रहे हैं।


खैर, भगवन, अब और क्या-क्या बताऊं, आपको ही कभी फुर्रसत मिले, तो धरती की ओर भी एक नजर मार लीजिएगा। आपके बारे में काफी सुन रखा है कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे, तब-तब आप कोई अवतार लेकर यहां आएंगे।
अच्छा भगवन, एक बात आपसे पूछनी थी- ये आपने अपने प्रचार के लिए इतने सारे बाबाओं को क्यों लगा रखा है? आपको भी प्रचार की जरूरत पड़ती है क्या? जिस गली में देखो, वहां आपका नाम लेते एक बाबा बैठा मिलता है। अब तो आलम यह हो गया है कि बाबाओं की पहुंच बैडरूम तक हो गई है। मतलब, टीवी पर भी हर चैनल पर एक बाबा दिख जाता है। आपको एक अंदर की बात बताऊं भगवन, कई चैनल वाले तो आपके दुश्मनों (भूतों) का भी प्रचार कर रहे हैं। पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रोता है, तो मां कहती है- चुप हो जा, नहीं तो भूतों वाला चैनल लगा दूंगी।

आखिर में भगवन आपसे एक छोटी-सी गुजारिश है- किसी से कहिएगा नहीं कि मैंने आपको पत्र लिखा है, नहीं तो मुझे धरती-निकाला दे दिया जाएगा। नमस्कार।

आपका शुभचिंतक
एक धरतीवासी
(यह रचना “शुक्रवार” पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है)

2 टिप्पणियाँ:

आमीन ने कहा…

samajh me nhi aa raha aapka blog... pls dekh le.

बेनामी ने कहा…

Pandey ji ...
Gud one , what a creative idea
Keep it up.....

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