एक ‘अ’ नाम का प्रेमी है। क्या आप इस प्रेमी को पहले से जानते-पहचानते हैं? शायद नहीं जानते-पहचानते होंगे, क्योंकि यह तो मेरी कहानी का पात्र है और मैं ही इससे आपको मिलवाउंगा...
खैर, जब ‘अ’ नाम का प्रेमी है, तो जाहिर सी बात है कि उसकी कोई न कोई प्रेमिका भी होगी! प्रेमिका ही नहीं होगी, तो वह किस बात का प्रेमी! तो साहब, इसकी एक प्रेमिका भी है, जिसका नाम ‘ब’ है। आप शायद इसे भी नहीं जानते होंगे? कहां से जानेंगे, यह भी तो मेरी कहानी...।
- आगे बताएंगे कि कहानी क्या है... ?
बताता हूं, बताता हूं...हां तो साहब, दोनों के बीच गजब का प्रेम है। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं। इसका एक उदाहरण देखिए, एक बार प्रेमिका ने प्रेमी से पूछा- तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो, तो जानते हैं प्रेमी ने क्या कहा? प्रेमी ने कहा- मैं तुम्हारे लिए आकाश से चांद-तारे तोड़कर ला सकता हूं। देखिए साहब, क्या गजब का प्रेम था दोनों में, प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए चांद-तारे तोड़कर लाने की बात कर रहा है...।
- वे प्रेमी-प्रेमिका हैं, तो इस तरह की बातें उनके बीच में होंगी ही...यह बताओ कि आपकी प्रेम कहानी में आगे क्या होता है...?
अब इससे आगे क्या होना है, जब दोनों एक-दूसरे के बिना अपने आपको अधूरा समझने लगे, तो उन्होंने शादी कर ली। और अब वे पूरी तरीके से दो जिस्म एक जान हो लिए। अब दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकती है। यानी उन दोनों को साथ-साथ रहने का सामाजिक प्रमाण-पत्र मिल गया है।
- अरे यार, यह बताओ कि इस प्रेम कहानी में आगे क्या होता है...?
अब आगे क्या होना था साहब, दोनों का मिलन हो गया है, तो जाहिर सी बात है कि इसके बाद उनके बच्चे ही होने थे, वही हुए...
उन्होंने अपने बच्चों को खूब प्यार दिया। ऊंची तालीम दी। इससे उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल रहा। वे अच्छी-अच्छी कंपनियों में ऊंचे-ऊंचे ओहदे पर काम करने लगे। यह देखकर ‘अ’ व ‘ब’ को काफी खुशी हुई।
- यहां तक हमारे समझ में कहानी आ गई, आगे बताओ कि फिर क्या हुआ...?
‘अ’ व ‘ब’ अब काफी बूढ़े हो चुके थे। करीब साठ-सत्तर साल के। लेकिन उनका प्यार आज भी जवां था। सोलह साल की तरह। जब वे पहली बार मिले थे।
- अरे यार, इस प्रेम कहानी में कोई ट्वीस्ट-विस्ट भी है या नहीं...?
क्या हर प्रेम कहानी में ट्वीस्ट-विस्ट होना जरूरी है? क्या हर प्रेम कहानी मार-धाड़ या सामाजिक विद्रोह जरूरी है? आपकी लिखी प्रेम कहानी में ये सब चीजें जरूरी होंगी, पर अपन की कहानी में ऐसा बिल्कुल नहीं है...
- अच्छा, आगे बताओ कि कहानी में क्या हुआ?
नहीं, आप खुद ही बताइए कि अब कहानी में होने के लिए कुछ बचा है? दोनों ने प्रेम कर लिया, शादी कर ली, बच्चे पैदा कर लिए और आज भी उनके बीच प्यार की तासीर सोलह साल वाली ही है, एक प्रेम कहानी में इससे ज्यादा और क्या चाहिए... ! ‘अ’ व ‘ब’ की प्रेम कहानी यहीं समाप्त होती है...
- क्या सड़ी हुई प्रेम कहानी है...!
अच्छा, मेरी लिखी हुई कहानी सड़ी है... अच्छा, यह बताइए साहब कि अगर मैं अपनी इस प्रेम कहानी में ‘अ’ की जगह आपका और ‘ब’ की जगह आपकी प्रेमिका का नाम लिख देता, तब क्या कहना होता आपका, मेरी इस सड़ी हुई प्रेम कहानी के बारे में...बताओ....बताओ…?
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
शनिवार, 26 सितंबर 2009
आडवाणी
एक ने कहा-
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा!
दूसरे ने भी कहा-
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा, जो करना है, वो कर लो!
यार, आखिर में हुआ क्या, यह बताओ!
जो चिल्ला रहा था-
आडवाणी तुम जाओ, आडवाणी तुम जाओ
आडवाणी ने उसे ही चलता कर दिया!
और सुनो…
आडवाणी ने अपने आदमियों को और ऊंची पोस्ट पर बैठा दिया
और सुनो…
अब कोई नहीं कहता-
आडवाणी तुम जाओ!
जो चाह भी रहे थे यह कहना
अब वो कहते हैं-
आडवाणी तुम्हें जब जाना हो, तब जाओ!
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा!
दूसरे ने भी कहा-
आडवाणी अब तुम जाओ!
आडवाणी ने कहा-
नहीं जाऊंगा, जो करना है, वो कर लो!
यार, आखिर में हुआ क्या, यह बताओ!
जो चिल्ला रहा था-
आडवाणी तुम जाओ, आडवाणी तुम जाओ
आडवाणी ने उसे ही चलता कर दिया!
और सुनो…
आडवाणी ने अपने आदमियों को और ऊंची पोस्ट पर बैठा दिया
और सुनो…
अब कोई नहीं कहता-
आडवाणी तुम जाओ!
जो चाह भी रहे थे यह कहना
अब वो कहते हैं-
आडवाणी तुम्हें जब जाना हो, तब जाओ!
समझदार शहरी
एक "समझदार शहरी" ने
दीवारों पर लिखा था-
"गधे के पूत यहां मत मूत"
दीवारों पर लिखा था-
"गधे के पूत यहां मत मूत"
नल और ठूंठ
अब नहीं सुनाई देती
टप-टप की आवाज
अपने शहर में
नल खड़े हैं-
ठूंठ की तरह
टप-टप की आवाज
अपने शहर में
नल खड़े हैं-
ठूंठ की तरह
सोमवार, 4 मई 2009
सबक
झांसा दो, मगर ऐसा...
एक ब्रह्मांड है। इस ब्रह्मांड पर एक धरती है। इस धरती पर एक देश है। इस देश में लोकतंत्र नाम की एक चीज है। यानी यहां जनता को एक हक मिला हुआ है। वह जिसकी चाहे, उसकी सरकार बना सकती है। हर पांच साल बाद यहां चुनाव होते हैं। चुनाव में भाग लेने वाली एक पार्टी पंजा छाप है और दूसरी कमल छाप। इसके अलावा कई और पार्टियां भी हैं। उनका नाम जानना अभी आपके लिए बहुत जरूरी नहीं है। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि इन दो पार्टियों में से कोई एक सरकार बना लेती है।
खैर, बात को रबर की तरह से खींचने से क्या फायदा। मैं जो कहना चाह रहा हूं, आप वह सुन लीजिए। होता यह है कि ये तमाम पार्टियां हर चुनाव में जनता को
ए-क्लास का झांसा दे देती हैं। यानी उसके हक को हड़प जाती हैं और डकार भी नहीं लेतीं।
अब कहानी का सार सुन लीजिए। दरअसल, झांसे कई तरह दिए जा सकते हैं। हो सकता है कि आपने भी कभी किसी को किसी तरह का कोई झांसा दिया होगा। लेकिन शर्तिया है कि ऐसा झांसा आपने आज तक नहीं दिया होगा। क्या आप साठ साल तक झांसा देकर किसी जनता को ठेंगा दिखा सकते हैं?
अब कहानी से सीख भी ले लीजिए। यह झांसे का सबसे उत्तम तरीका है। दे सको तो ऐसा झांसा दो।
एक ब्रह्मांड है। इस ब्रह्मांड पर एक धरती है। इस धरती पर एक देश है। इस देश में लोकतंत्र नाम की एक चीज है। यानी यहां जनता को एक हक मिला हुआ है। वह जिसकी चाहे, उसकी सरकार बना सकती है। हर पांच साल बाद यहां चुनाव होते हैं। चुनाव में भाग लेने वाली एक पार्टी पंजा छाप है और दूसरी कमल छाप। इसके अलावा कई और पार्टियां भी हैं। उनका नाम जानना अभी आपके लिए बहुत जरूरी नहीं है। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि इन दो पार्टियों में से कोई एक सरकार बना लेती है।
खैर, बात को रबर की तरह से खींचने से क्या फायदा। मैं जो कहना चाह रहा हूं, आप वह सुन लीजिए। होता यह है कि ये तमाम पार्टियां हर चुनाव में जनता को
ए-क्लास का झांसा दे देती हैं। यानी उसके हक को हड़प जाती हैं और डकार भी नहीं लेतीं।
अब कहानी का सार सुन लीजिए। दरअसल, झांसे कई तरह दिए जा सकते हैं। हो सकता है कि आपने भी कभी किसी को किसी तरह का कोई झांसा दिया होगा। लेकिन शर्तिया है कि ऐसा झांसा आपने आज तक नहीं दिया होगा। क्या आप साठ साल तक झांसा देकर किसी जनता को ठेंगा दिखा सकते हैं?
अब कहानी से सीख भी ले लीजिए। यह झांसे का सबसे उत्तम तरीका है। दे सको तो ऐसा झांसा दो।
परिचय
ब्लागर मित्रों को मेरा नमस्कार। मेरा नाम तो आप जान ही रहे हैं- ललित पांडे। यह भी बता चुका हूं कि लिखास रोग से पीड़ित हूं। ना..ना.. रोग का मतलब किसी बीमारी से कतई नहीं है। मुझे कोई बीमारी नहीं है। लिखास रोग तो मुझे जिंदगी देता
है। मेरे दिमाग को साफ रखता है। हां, केवल यह बताना बाकी है कि अपने रोग को बढ़ाने के लिए इन दिनों में पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में बैठा हूं।
है। मेरे दिमाग को साफ रखता है। हां, केवल यह बताना बाकी है कि अपने रोग को बढ़ाने के लिए इन दिनों में पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में बैठा हूं।
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